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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

बाल गीत : अपनी माँ का मुखड़ा..... संजीव वर्मा 'सलिल'

बाल गीत :


अपनी माँ का मुखड़ा.....


संजीव वर्मा 'सलिल'

*
*

मुझको सबसे अच्छा लगता

अपनी माँ का मुखड़ा.....

*

सुबह उठाती गले लगाकर,

फिर नहलाती है बहलाकर.

आँख मूँद, कर जोड़ पूजती

प्रभु को सबकी कुशल मनाकर.

देती है ज्यादा प्रसाद फिर

सबकी नजर बचाकर.


आंचल में छिप जाता मैं

ज्यों रहे गाय सँग बछड़ा.

मुझको सबसे अच्छा लगता

अपनी माँ का मुखड़ा.....

*

बारिश में छतरी आँचल की.

ठंडी में गर्मी दामन की..

गर्मी में धोती का पंखा,

पल्लू में छाया बादल की.

कभी दिठौना, कभी आँख में

कोर बने काजल की..


दूध पिलाती है गिलास भर -
कहे बनूँ मैं तगड़ा. ,
मुझको सबसे अच्छा लगता -
अपनी माँ का मुखड़ा!

*****

शनिवार, 2 जनवरी 2010

गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका



तितलियाँ


संजीव 'सलिल'
*


यादों की बारात तितलियाँ.


कुदरत की सौगात तितलियाँ..


बिरले जिनके कद्रदान हैं.


दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..


नाच रहीं हैं ये बिटियों सी


शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..


बद से बदतर होते जाते.


जो, हैं वे हालात तितलियाँ..


कली-कली का रस लेती पर


करें न धोखा-घात तितलियाँ..


हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं


क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..


'सलिल' भरोसा कर ले इन पर


हुईं न आदम-जात तितलियाँ..


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