गीत
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी करुण - व्यथाएँ हैं....
अपने-अपने पिंजरों में हैं कैद सभी।
और चाहते हैं होना स्वच्छंद सभी।
श्वास-श्वास में कथ्य-कथानक हैं सबमें-
सत्य कहूँ गुन-गुन करते हैं छंद सभी।
अलग-अनूठे शिल्प-बिम्ब-उपमाएँ हैं
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
अक्षर-अजर-अमर हैं आत्माएँ सबकी।
प्रेरक-प्रबल-अमित हैं इच्छाएँ सबकी।
माँग-पूर्ती, उपभोक्ता-उत्पादन हैं सब।
खन-खन करती मोहें मुद्राएँ सबकी।
रास रचता वह, सब बृज बालाएँ है
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
जो भी मिलता है क्रेता-विक्रेता है।
किन्तु न कोई नौका अपनी खेता है।
किस्मत शकुनी के पाँसों से सब हारे।
फिर भी सोचा अगला दाँव विजेता है।
मौन हुई माँ, मुखर-चपल वनिताएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
करें अर्चना स्वहितों की तन्मय होकर।
वरें वंदना-पथ विधि का मृण्मय होकर।
करें कामना, सफल साधना हो अपनी।
लीन प्रार्थना में होते बेकल होकर।
तृप्ति-अतृप्ति नहीं कुछ, मृग- त्रिश्नाएं हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
यह दुनिया मंडी है रिश्तों-नातों की।
दाँव-पेंच, छल-कपट, घात-प्रतिघातों की।
विश्वासों की फसल उगाती कलम सदा।
हर अंकुर में छवि है गिरते पातों की।
कूल, घाट, पुल, लहर, 'सलिल' सरिताएँ हैः।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
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हिंदी गीति काव्य सलिला का प्रवाह लोक-रंजन के साथ भवः-भय भंजन को इष्ट मानकर सत्-शिव-सुंदर के माध्यम से सत्-चित्त-आनंद की प्राप्ति के लिए हुआ है. निराकार अनादि-अनंत अक्षर ब्रम्ह की शब्द शक्ति भाषा के रूप में साकार होकर संवेदनाओं की अभिव्यक्ति कराकर नश्वर को शाश्वत से संयुक्त करती है. भारतीय मनीषा इसीलिये साहित्य का हेतु 'सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय' मानती है. हिन्दी गीति काव्य सलिला 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' अर्थात सभी सुखी हों के आप्त वाक्य को शब्द रूप देकर अखंड आनंद का सागर बन सकी है.
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शनिवार, 14 मार्च 2009
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